दिल्ली में जमानत कैसे मिलती है – BNSS प्रक्रिया | SRLM Law Associates

दिल्ली में जमानत कैसे मिलती है: BNSS के तहत पूरी प्रक्रिया

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लेखक: एडवोकेट शुभम मेहता · अपडेट: 7 अक्टूबर 2026 · 7 मिनट

दिल्ली में जमानत कैसे मिलती है, यह सबसे पहले इस पर निर्भर करता है कि अपराध जमानती है या गैर-जमानती। जमानती अपराध में जमानत अधिकार है और पुलिस या कोर्ट को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 478 के तहत आरोपी को बॉन्ड पर छोड़ना होता है। गैर-जमानती अपराध में मजिस्ट्रेट के सामने धारा 480 या सेशंस कोर्ट या दिल्ली हाई कोर्ट में धारा 483 के तहत अर्जी देनी होती है।

इस गाइड में जमानत के प्रकार, अर्जी कहां और कैसे दें, दस्तावेज, जमानतदार और शर्तों की पूरी जानकारी सरल भाषा में दी गई है। अंग्रेज़ी में विस्तृत गाइड के लिए देखें: How to get bail in Delhi।

मुख्य बातें

  • जमानती अपराध में जमानत अधिकार है (धारा 478 BNSS)।
  • गैर-जमानती अपराध में जमानत कोर्ट के विवेक पर है (धारा 480 और 483 BNSS)।
  • गिरफ्तारी की आशंका हो तो अग्रिम जमानत धारा 482 BNSS के तहत सेशंस कोर्ट या हाई कोर्ट से मिल सकती है।
  • तय समय (60 या 90 दिन) में चार्जशीट न आए तो डिफ़ॉल्ट जमानत का अधिकार बनता है (धारा 187(3) BNSS)।
  • जमानत के लिए आमतौर पर बेल बॉन्ड और जमानतदार की जरूरत होती है।

जमानत क्या है?

जमानत का मतलब है कि केस चलने तक आरोपी को कुछ शर्तों पर हिरासत से रिहा किया जाए, ताकि वह जरूरत पड़ने पर कोर्ट और जांच में हाजिर रहे। जमानत मिलने का मतलब बरी होना नहीं है; केस आगे चलता रहता है।

जमानत के प्रकार

प्रकारकब लागूधारा (BNSS)पुरानी धारा (CrPC)
जमानती अपराध में जमानतअपराध जमानती हो478436
गैर-जमानती अपराध में जमानत (मजिस्ट्रेट)गिरफ्तारी के बाद480437
सेशंस कोर्ट या हाई कोर्ट से जमानतगंभीर अपराध या मजिस्ट्रेट से अर्जी खारिज483439
अग्रिम जमानतगिरफ्तारी से पहले, आशंका होने पर482438
डिफ़ॉल्ट जमानततय समय में चार्जशीट दाखिल न हो187(3)167(2)
विचाराधीन कैदी की रिहाईअधिकतम सजा का आधा (पहली बार के अपराधी के लिए एक-तिहाई) हिरासत में बीत जाए479436A

दिल्ली में जमानत की अर्जी कहां दें?

ज्यादातर मामलों में पहली अर्जी उस मजिस्ट्रेट कोर्ट में दी जाती है जहां आरोपी को पेश किया गया है, जैसे रोहिणी, तीस हजारी, कड़कड़डूमा, साकेत, द्वारका, पटियाला हाउस या राउज़ एवेन्यू कोर्ट। जिन अपराधों की सुनवाई केवल सेशंस कोर्ट कर सकता है, उनमें अर्जी सीधे सेशंस कोर्ट में दी जाती है। सेशंस कोर्ट से अर्जी खारिज होने पर दिल्ली हाई कोर्ट में धारा 483 के तहत अर्जी दी जा सकती है।

जमानत की प्रक्रिया: कदम दर कदम

  1. FIR की कॉपी, गिरफ्तारी मेमो और रिमांड आदेश लें।
  2. वकील से जमानत अर्जी तैयार करवाएं, जिसमें आरोपों पर जवाब, आरोपी की पृष्ठभूमि और जमानत के आधार हों।
  3. अर्जी सही कोर्ट में दाखिल करें; कोर्ट जांच अधिकारी से जवाब (रिपोर्ट) मांगता है।
  4. सुनवाई में अभियोजन और बचाव पक्ष की दलीलें होती हैं।
  5. जमानत मंजूर होने पर बेल बॉन्ड और जमानतदार के दस्तावेज जमा करें।
  6. जमानतदार का सत्यापन होने के बाद रिहाई वारंट जेल भेजा जाता है।

रोहिणी कोर्ट में हमारे अनुभव में, जिन अर्जियों के साथ स्थायी पता, नौकरी या व्यवसाय का प्रमाण और परिवार की जानकारी स्पष्ट रूप से दी जाती है, उनमें कोर्ट को फरार होने की आशंका कम लगती है।

जरूरी दस्तावेज

दस्तावेजकिसके लिए
FIR और गिरफ्तारी मेमो की कॉपीअर्जी के साथ
आरोपी का पहचान और पता प्रमाणअर्जी के साथ
नौकरी या व्यवसाय का प्रमाणजड़ों और स्थिरता को दिखाने के लिए
जमानतदार का पहचान पत्र और पता प्रमाणबेल बॉन्ड के लिए
जमानतदार की संपत्ति या आय का प्रमाण (FD, वाहन RC, संपत्ति के कागज)जमानत राशि के लिए
मेडिकल रिकॉर्ड, यदि होंस्वास्थ्य के आधार पर जमानत के लिए

कोर्ट जमानत देते समय क्या देखता है?

  • अपराध की प्रकृति और गंभीरता, और संभावित सजा।
  • आरोपी के खिलाफ सबूत कितने मजबूत हैं।
  • आरोपी के फरार होने की आशंका।
  • गवाहों को प्रभावित करने या सबूत से छेड़छाड़ की आशंका।
  • आरोपी का पुराना आपराधिक रिकॉर्ड।
  • आरोपी की उम्र, स्वास्थ्य और हिरासत में बिताया समय।

जमानत की सामान्य शर्तें

  • हर तारीख पर कोर्ट में हाजिर होना।
  • जांच अधिकारी के बुलाने पर जांच में शामिल होना।
  • गवाहों या पीड़ित से संपर्क न करना।
  • कोर्ट की अनुमति के बिना देश से बाहर न जाना; जरूरत हो तो पासपोर्ट जमा करना।
  • मोबाइल नंबर और पता बदलने पर जानकारी देना।

शर्तें तोड़ने पर जमानत रद्द की जा सकती है।

अग्रिम जमानत

अगर किसी को गिरफ्तारी की आशंका है, तो वह धारा 482 BNSS के तहत सेशंस कोर्ट या दिल्ली हाई कोर्ट में अग्रिम जमानत की अर्जी दे सकता है। विस्तृत जानकारी के लिए देखें: Anticipatory bail in Delhi।

वकील कैसे मदद करते हैं

जमानत की अर्जी में तथ्य, कानूनी आधार और फैसलों का सही इस्तेमाल बहुत मायने रखता है। दिल्ली में बेल वकील सही कोर्ट चुनने, अर्जी तैयार करने और सुनवाई में बहस करने में मदद करते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जमानती और गैर-जमानती अपराध में क्या अंतर है?

जमानती अपराध में जमानत अधिकार है और पुलिस या कोर्ट को बॉन्ड पर छोड़ना होता है। गैर-जमानती अपराध में जमानत कोर्ट के विवेक पर है, और कोर्ट अपराध की गंभीरता, सबूत और फरार होने की आशंका देखकर फैसला करता है।

जमानत मिलने में कितना समय लगता है?

जमानती अपराध में उसी दिन जमानत मिल सकती है। गैर-जमानती अपराध में मजिस्ट्रेट कोर्ट में आमतौर पर कुछ दिनों में सुनवाई हो जाती है, जबकि सेशंस कोर्ट या हाई कोर्ट में ज्यादा समय लग सकता है।

डिफ़ॉल्ट जमानत क्या है?

अगर पुलिस तय समय में चार्जशीट दाखिल नहीं करती, तो आरोपी को डिफ़ॉल्ट जमानत का अधिकार मिलता है। यह समय 10 साल या उससे ज्यादा सजा वाले अपराधों में 90 दिन और बाकी में 60 दिन है (धारा 187(3) BNSS)।

क्या जमानत के लिए जमानतदार जरूरी है?

ज्यादातर मामलों में कोर्ट बेल बॉन्ड के साथ एक या दो जमानतदार मांगता है। जमानतदार को पहचान और संपत्ति या आय का प्रमाण देना होता है। कुछ मामलों में कोर्ट केवल निजी बॉन्ड पर भी छोड़ सकता है।

मजिस्ट्रेट से जमानत खारिज हो जाए तो क्या करें?

मजिस्ट्रेट से अर्जी खारिज होने पर सेशंस कोर्ट में धारा 483 BNSS के तहत अर्जी दी जा सकती है। सेशंस कोर्ट से भी खारिज होने पर दिल्ली हाई कोर्ट में अर्जी दी जा सकती है।

क्या जमानत रद्द हो सकती है?

हां। अगर आरोपी जमानत की शर्तें तोड़ता है, गवाहों को धमकाता है या तारीखों पर हाजिर नहीं होता, तो कोर्ट जमानत रद्द कर सकता है और आरोपी को दोबारा हिरासत में भेजा जा सकता है।

निष्कर्ष

दिल्ली में जमानत कैसे मिलती है, यह अपराध के प्रकार और सही कोर्ट पर निर्भर करता है। समय पर अर्जी, पूरे दस्तावेज और शर्तों का पालन जमानत की संभावना को मजबूत करते हैं।

Advocate Shubham Mehta, SRLM Law Associates, Delhi

Written and reviewed by Advocate Shubham Mehta
Advocate, Bar Council of Delhi (Enrl. No. D/6398/2021), and head of SRLM Law Associates. He practises before Rohini Courts, other Delhi District Courts, Family Courts, consumer commissions and the Delhi High Court. More about the firm

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This article is for general information only and is not legal advice.